मंगलवार, 23 सितंबर 2025

इतना ही पल काफी है


इतना  ही  पल  काफी  है  

हार  और  जीत  इन  दोनों  से  पार

स्मृतियों  के  गुजरते  देश  में  जाने  को

बीते  लम्हे  की   खुशबू   ओढ़े   किसी  लिफाफे

की    तहे   परतों   को   खोलता  हुआ 

झरोखों   में    ढलता   दिन

प्रभात   का   अभिव्यंजक

पुलकों  में  समाविष्ट   मन  की   हलचल  का   तार 

मंगलवार, 9 सितंबर 2025

देख उसे जो मंद मंद मुस्काती थी ..!

Veena


वीणा आज रखी थी चुप 

छेड़े नहीं गए थे मधुर राग

उस पर , समय कुँठाव काली

चुप अंधेरे में खो गई थी

समाधिस्थ अंतर्मन में वो यों

रखी थी , बिन वादक के लय सजीव

विधुरनी हो गई थी 

बुधवार, 3 सितंबर 2025

ममत्व की प्यारी निंदिया


तूफां अन्धेरी गरजती रात 

सुनसान निःसृत अनजान

हवाओं का था केवल शोर

तारक जन अनगिनत अनन्त में

चमक रहे थे घुति से प्रकाशमय

कला में पूर्ण हो रहा था चंद्र घुतिमान

वेगवान झलक रहे थे बहते 

नवप्रभात का करते स्वागत

  नवप्रभात का करते स्वागत बीती रजनी की अलस छोड़ जीवन संघर्ष से अमृत खोज करुणा प्रेम दया का सोता नदियों में बहता गंगाजल