गुरुवार, 28 अगस्त 2025

माँ गंगे !



गंगा तुम दूर रहकर भी मेरे पास हो

मन आँचल में लहराता तेरा निर्मल जल

आँखों की ज्योति का सार प्रत्यक्ष है

तुमसे ही यह आधार मिला

प्रेम का सरिस सुकोमल उपहार मिला

करुणा ममत्व सुंदर हृदय उद्गार मिला

तेरे घाटों में चंचल मन को एकांत मिला

अग्नि की तपन में शीतलता का साथ 

बिना मोल जन्म - जन्म का प्यार मिला

भटके फिर लौटकर आए तेरी गोद में

जीवन को अपना बीता बचपन फिर एक बार मिला

तुझमे डूबकर ही आत्मा को अपने प्रभु का ध्यान मिला

बहती अविरल धारा ही तो ले आई साथ अपने

माँ गंगे ! तुम यूँही बहती रहना मननयनों में

एक दिन मैं आऊँगा भूला हुआ फिर अपने घर में

तेरे पावन जल में मिल के जो पाऊँगा

वर्णन क्या मैं कभी शब्दों में कर पाऊँगा

तेरा शिशु हूँ , है तू मेरी माता माँ गंगे !


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपके विचार कलम को नयी गति प्रदान करने में प्रेरणास्रोत के रुप में कार्य करते है । आप सभी का ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत व अभिनंदन है । 🙏

नवप्रभात का करते स्वागत

  नवप्रभात का करते स्वागत बीती रजनी की अलस छोड़ जीवन संघर्ष से अमृत खोज करुणा प्रेम दया का सोता नदियों में बहता गंगाजल