गुरुवार, 28 अगस्त 2025

माँ गंगे !



गंगा तुम दूर रहकर भी मेरे पास हो

मन आँचल में लहराता तेरा निर्मल जल

आँखों की ज्योति का सार प्रत्यक्ष है

तुमसे ही यह आधार मिला

प्रेम का सरिस सुकोमल उपहार मिला

करुणा ममत्व सुंदर हृदय उद्गार मिला

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

ये प्रेम ही



नदियाँ चुपचाप नील गगन में बहती है ।

वे हमसे चुपचाप कुछ कहती है ।

श्वेत - नील स्वच्छ पयो परिधान

रजतवर्ण चाँदी सा बर्क

टुकड़ा भर देता वेग गति में

झरने से बहती कलकल

ध्वनि शांत ब्रह्म निनादनी

हरा जंगल चहुँओर

कोयल कूँजती डाली पे

नवप्रभात का करते स्वागत

  नवप्रभात का करते स्वागत बीती रजनी की अलस छोड़ जीवन संघर्ष से अमृत खोज करुणा प्रेम दया का सोता नदियों में बहता गंगाजल